रात अपने चरम पर थी। आसमान पर बिखरे तारे मानो अनगिनत दीपकों की तरह टिमटिमा रहे थे। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था, सिर्फ हवा की धीमी सरसराहट और गुलाब की पंखुड़ियों की महक वातावरण में घुली हुई थी। उस पुराने महल के आँगन में, जहाँ सदियों पुरानी एक विशाल घड़ी दीवार पर जड़ी थी, समय जैसे रुक-सा गया था। घड़ी की सुइयाँ रोमन अंकों को छूते हुए भी जैसे टिक-टिक करना भूल गई थीं।

उस घड़ी के सामने, दो परछाइयाँ खड़ी थीं।

वह गहरे हुड वाले कोट में, लंबा और रहस्यमयी। उसके चेहरे पर युगों की थकान और सदियों का दर्द लिखा हुआ था। उसकी आँखें, गहरी और काली, पर उनमें अनगिनत कहानियाँ छिपी थीं—विजय की, पराजय की, जीवन और मृत्यु की। वह समय का संरक्षक था, अमर, जिसने हर युग को आते-जाते देखा था। उसकी आँखों के कोनों में छिपी उदासी बताती थी कि अमरता भी कभी-कभी कैद जैसी लगती है।

और उसके सामने वह खड़ी थी—काले रेशमी गाउन में, जिसकी लहराती झालरें हवा में उड़ रही थीं। उसकी त्वचा पर चाँदनी का उजाला ऐसे पड़ रहा था मानो वह किसी और दुनिया से उतरी हो। उसकी आँखों में कोमलता और चाहत थी। उसने अपना हाथ धीरे से बढ़ाकर उसके सीने पर रखा। उसकी उँगलियों की नर्मी उसके दिल की धड़कनों से जुड़ गई। मानो वह यह सुनिश्चित करना चाहती हो कि यह धड़कन सिर्फ उसकी ही वजह से चल रही है।

उनके चारों ओर गुलाब की लाल पंखुड़ियाँ हवा में घूम रही थीं। कुछ उनके बालों में उलझ जातीं, कुछ पैरों के पास गिरकर ज़मीन पर कालीन-सा बिछ जातीं। हर पंखुड़ी जैसे फुसफुसा रही थी—प्रेम सुंदर है, लेकिन क्षणभंगुर भी।

उसने गहरी साँस ली और धीमी आवाज़ में कहा, “समय… हमेशा हमारा दुश्मन रहा है।”

उसकी आवाज़ में सदियों पुरानी थकान और टूटे हुए दिल का बोझ था।

उसने उसकी आँखों में सीधा देखा। उसकी पलकों पर नमी थी, लेकिन उनमें एक दृढ़ता भी थी। उसने उसका कोट कसकर पकड़ लिया और कहा, “नहीं… समय हमारा दुश्मन नहीं है। हम उसे चुनौती देंगे। हमारा प्रेम समय से भी परे है।”

उसकी यह बात सुनकर उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आई। वह मुस्कान मधुर भी थी और दुखभरी भी। उसने अपने हाथ से उसके चेहरे को छुआ, मानो उसके नश्वर गालों की गर्माहट को अपनी स्मृतियों में हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहता हो।

चारों ओर की हवा बदल गई। घड़ी की टिक-टिक धीमी हो गई। लाल पंखुड़ियाँ हवा में रुक गईं, जैसे पूरा ब्रह्मांड इस क्षण को देखने के लिए ठहर गया हो।